पेयजल संकट से जूझती जनता के हक पर 'चहेतों' को फायदा पहुंचाने का खेल,सोन बैराज टेंडर घोटाला

कलेक्टर की सख्ती से खुला नगरीय प्रशासन विभाग की 'प्री-क्वालिफिकेशन' शर्त का बड़ा खेल; ईई को शो-कॉज नोटिस, निलंबन की तलवार 


Junaid Khan - शहडोल। शहर की प्यास बुझाने वाली सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना 'सोन बैराज निर्माण' को विभागीय सांठगांठ और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाने की एक बड़ी और शर्मनाक साजिश बेनकाब हुई है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के अधिकारियों द्वारा किसी विशेष ठेकेदार या कंपनी को अनुचित लाभ (विशिष्ट लाभ) पहुंचाने के उद्देश्य से टेंडर प्रक्रिया में जानबूझकर 'प्री-क्वालिफिकेशन' की ऐसी शर्तें जोड़ी गईं, जिससे पूरी निविदा प्रक्रिया ही दूषित हो गई। जब इस बंदरबांट और नियम-विरुद्ध खेल की भनक उच्च स्तर पर लगी, तो मध्य प्रदेश शासन द्वारा गत 27 मई को इस टेंडर को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया गया। इस पूरे गंभीर मामले को लेकर जिले के मुखिया कलेक्टर डॉ. केदार सिंह ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए कार्यपालन यंत्री (EE) अरविंद कुमार शर्मा को कड़ा कारण बताओ नोटिस जारी किया है। प्रशासन ने साफ लहजे में तीन दिन के भीतर जवाब मांगते हुए पूछा है कि इस घोर लापरवाही और नियम विरुद्ध कृत्य के लिए क्यों न उनके खिलाफ दंडात्मक व अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए निलंबन का प्रस्ताव सीधे शासन को भेज दिया जाए।

लाखों की जनता प्यासी और अफसरशाही चहेतों को उपकृत करने में व्यस्त 

यह केवल एक टेंडर का निरस्त होना नहीं है, बल्कि शहडोल की जनता के मूलभूत अधिकारों के साथ किया गया एक अक्षम्य खिलवाड़ है। शहडोल नगर की पेयजल समस्या के स्थाई निराकरण के लिए जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMF) मद से ₹27.43 करोड़ की भारी-भरकम राशि 15 दिसंबर 2025 को ही स्वीकृत कर जारी कर दी गई थी। मंशा यह थी कि काम युद्धस्तर पर शुरू होगा और समय पर पूरा होगा, लेकिन नगरीय प्रशासन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी जनता को पानी पिलाने के बजाय अपनी जेबें गर्म करने और पसंदीदा चेहरों को करोड़ों का ठेका दिलाने की 'फाइल इंजीनियरिंग' में मसरूफ रहे। इस प्रशासनिक भ्रष्टाचार और चहेतों को लाभ पहुंचाने की जिद का नतीजा यह हुआ कि पूरी योजना अब सीधे एक साल के लिए ठंडे बस्ते में चली गई है। सवाल यह उठता है कि अफसरों की इस 'अपराधिक लापरवाही' के कारण जो जनता भीषण गर्मी और जल संकट में बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है, उसके इस एक साल के विलंब और मानसिक प्रताड़ना का हिसाब कौन देगा?

उपमुख्यमंत्री दे चुके थे जल संसाधन विभाग से काम कराने की सलाह, फिर क्यों अड़ा रहा विभाग? 

इस पूरे मामले में एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है, जो सीधे तौर पर विभागीय तानाशाही और सिंडिकेट की मनमानी को दर्शाता है। सोन नदी पर इस बैराज निर्माण को लेकर पूर्व में ही जिले के प्रभारी मंत्री व मध्य प्रदेश शासन केबउपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने स्पष्ट रूप से तकनीकी बारीकियों को देखते हुए 'जल संसाधन विभाग' (Water Resources Department) के माध्यम से निर्माण कराने की लिखित व व्यावहारिक सलाह दी थी। लेकिन, मलाईदार बजट और कमीशनखोरी के चक्कर में नगरीय प्रशासन विभाग के नुमाइंदे इस काम को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे। अब जब इस विभाग की कलई खुल चुकी है, तो शहर के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश है। जनता अब सीधे सरकार और प्रशासन को चुनौती दे रही है कि यदि वास्तव में मंशा साफ है, तो इस महापरियोजना का काम तुरंत जल संसाधन विभाग को सौंपा जाए ताकि बिना किसी भ्रष्टाचार और तकनीकी खामी के काम समय सीमा में पूरा हो सके। देखना यह है कि कलेक्टर के इस नोटिस के बाद क्या केवल कागजी खानापूर्ति होगी या इस 'टेंडर फिक्सिंग' के पीछे छिपे बड़े मगरमच्छों और सफेदपोशों के चेहरों से भी नकाब हटेगा।

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