पल्स पोलियो अभियान में 'थमी हुई मौत' का वितरण,आंगनबाड़ी केंद्र में मासूमों को बांट दी एक्सपायरी डेट की आयरन सिरप
Junaid Khan - शहडोल। स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही और नौनिहालों की जिंदगी से सरेआम खिलवाड़ करने का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने पूरे प्रशासनिक अमले की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। राष्ट्रीय पल्स पोलियो अभियान जैसे अत्यंत संवेदनशील मौके पर, जहां बच्चों को जीवनदान देने की खुराक पिलाई जा रही थी, वहीं पुरानी बस्ती स्थित वार्ड नंबर 36 के आंगनबाड़ी केंद्र (कल्लू आटा चक्की के पास) में मासूमों को एक्सपायरी डेट की आयरन सिरप और टैबलेट बांट दी गईं। पल्स पोलियो की खुराक पिलाने आए अभिभावकों को वहां ड्यूटी पर तैनात आशा कार्यकर्ता ने बिना जांच-परख किए धड़ल्ले से एक्सपायरी सिरप की बोतलें सौंप दीं। यह तो गनीमत रही कि कुछ जागरूक पालकों ने घर जाकर दवा की शीशी पर छपी तारीख देख ली, जिससे एक बड़ा हादसा होते-होते टल गया। जैसे ही यह खबर फैली, परिजनों में आक्रोश व्याप्त हो गया और वे भड़कते हुए वापस केंद्र पहुंचे, जिससे पूरे महकमे में हड़कंप मच गया। अपनी गर्दन फंसती देख आंगनबाड़ी अमला आनन-फान में फोन लगा-लगाकर घरों से दवा वापस मंगवाने की जुगत में जुट गया, ताकि इस प्रशासनिक पाप पर पर्दा डाला जा सके।
सवालों के घेरे में जिम्मेदार,स्टोर से लेकर टेबल तक सब 'अंधेर नगरी, चौपट राजा'
यह महज एक आशा कार्यकर्ता की व्यक्तिगत चूक नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर स्वास्थ्य विभाग की उस भ्रष्ट और लापरवाह व्यवस्था को उजागर करता है जो जनता की जान की कीमत पर सोई हुई है। सबसे बड़ा तीखा सवाल यह उठता है कि जिला मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और दवा स्टोर प्रबंधन आखिर क्या कर रहे थे? जो दवाएं महीनों पहले अपनी मियाद (एक्सपायरी डेट) खो चुकी थीं, वे सरकारी स्टोर रूम से बाहर कैसे निकलीं? वितरण की श्रृंखला में शामिल जिम्मेदार अधिकारियों ने सप्लाई के वक्त और आंगनबाड़ी तक खेप पहुंचने से पहले इसकी भौतिक जांच क्यों नहीं की? क्या स्वास्थ्य विभाग ने मासूम बच्चों को केवल कागजी आंकड़ों को चमकाने और सरकारी बजट को खपाने का जरिया मान लिया है? इस पूरे मामले पर जिला टीकाकरण अधिकारी डॉ. अंशुमन सोनारे का यह कहकर पल्ला झाड़ लेना कि 'कार्यकर्ता ने सिरप वापस मंगा ली है', उनकी अपनी प्रशासनिक जवाबदेही से भागने की नाकाम कोशिश को दर्शाता है। दवा वापस मंगा लेना इस संगीन अपराध का समाधान नहीं है, बल्कि यह उस गंभीर लापरवाही की पुष्टि है जिसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
कानूनी और प्रशासनिक चुनौती, क्या सिर्फ कागजी खानापूर्ति होगी या नपेंगे बड़े अफसर?
इस गंभीर मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि मैदानी स्तर पर सरकारी योजनाएं और दवा वितरण रामभरोसे चल रहा है। एक्सपायरी सिरप बांटना सीधे तौर पर मासूमों की हत्या के प्रयास जैसी आपराधिक लापरवाही की श्रेणी में आता है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और प्रदेश का स्वास्थ्य महकमा इस संवेदनशील मामले में क्या रुख अपनाता है। क्या हमेशा की तरह किसी अदने से संविदाकर्मी या आशा कार्यकर्ता को बलि का बकरा बनाकर फाइल बंद कर दी जाएगी, या फिर मुख्य दवा स्टोर के प्रभारी, मॉनिटरिंग अधिकारियों और जिला स्तर के बड़े साहबों पर भी शिकंजा कसा जाएगा? इस खबर के बाद अब जागरूक जनता और पीड़ित परिजनों ने सीधे तौर पर प्रशासन को चुनौती दी है कि अगर इस 'खूनी खेल' के असली दोषियों पर तत्काल कड़ी और दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई, तो विभाग के खिलाफ उग्र आंदोलन खड़ा किया जाएगा।
