धनपुरी खदान हादसा,मौत के मुहाने पर धकेले जा रहे श्रमिक, प्रशासन और SECL की साठगांठ पर उठे गंभीर सवाल
Junaid Khan - शहडोल। एसईसीएल (SECL) सोहागपुर एरिया की बंगवार (धनपुरी) अंडरग्राउंड कोयला खदान में हुआ दर्दनाक हादसा कोई सामान्य दुर्घटना नहीं, बल्कि सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर मुनाफे की अंधी दौड़ का खूनी नतीजा है। इस भीषण हादसे की सूचना मिलते ही हड़कंप मच गया। आनन-फानन में कलेक्टर डॉ. केदार सिंह ने शहडोल के एक निजी अस्पताल पहुंचकर भर्ती घायल श्रमिकों के स्वास्थ्य की जानकारी ली और चिकित्सकों को बेहतर से बेहतर इलाज मुहैया कराने के कड़े निर्देश दिए। कलेक्टर ने इस हादसे में दो श्रमिकों की असमय मौत पर गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि इस पूरी घटना में २ व्यक्तियों की दर्दनाक मृत्यु हुई है और 4 श्रमिक गंभीर रूप से घायल हैं। उन्होंने बताया कि मृतकों के आश्रितों को कंपनी के नियमों के तहत आर्थिक सहायता राशि प्रदान की जाएगी। अस्पताल में इस दौरान अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्री अभिषेक दीवान, अनुविभागीय अधिकारी राजस्व (SDM) श्रीमती अमृता गर्ग सहित भारी पुलिस बल और प्रशासनिक अमला तैनात रहा, जो अंदरूनी सुगबुगाहट और जनआक्रोश को दबाने की कोशिशों में जुटा नजर आया।
अवैध उत्खनन और सुरक्षा में सेंध,कब तक बलि चढ़ेंगे बेकसूर?
यह हादसा सीधे तौर पर उन सफेदपोशों और रसूखदारों को खुली चुनौती है, जो क्षेत्र में कोयले के अवैध कारोबार और खदानों में नियमों की धज्जी उड़ाने के खेल में शामिल हैं। स्थानीय समाचार पत्र में इस खदान की बदहाली और सुरक्षा में चूक की खबर प्रमुखता से प्रकाशित होने के बाद प्रशासन ने इसे गंभीरता से तो लिया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अखबार में प्रकाशित खबर का बड़ा असर हुआ और सोई हुई व्यवस्था जागी जरूर, पर दो पिताओं, दो बेटों के जीवन का चिराग बुझने के बाद। बंगवार खदान में जिस तरह से यह हादसा हुआ, उसने कोल माइंस कॉर्पोरेशन के उन दावों की पोल खोल कर रख दी है, जहां हर साल सुरक्षा सप्ताह के नाम पर लाखों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं। खदानों के भीतर वेंटिलेशन, रूफ बोल्टिंग और सपोर्ट सिस्टम को नजरअंदाज कर श्रमिकों को मौत के कुएं में धकेला जा रहा है। सूत्रों की मानें तो खदान के भीतर कई ऐसे संवेदनशील पॉइंट्स हैं, जहां अवैध और असुरक्षित तरीके से काम कराया जा रहा है, जिसे स्थानीय प्रबंधन और माइनिंग माफिया का मूक संरक्षण प्राप्त है।
कागजी मुआवजा और खोखले निर्देश,अब आर-पार की लड़ाई का वक्त
प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन हर बार की तरह इस बार भी मौतों का सौदा करने की तैयारी में हैं। आर्थिक सहायता राशि और चंद रुपयों का मुआवजा देकर इस खूनी लापरवाही की फाइल को बंद करने की पुरजोर कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। लेकिन वरिष्ठ और खोजी पत्रकारिता के नजरिए से देखा जाए, तो सवाल यह उठता है कि क्या चंद रुपयों से उन परिवारों के आंसुओं की कीमत चुकाई जा सकती है? घटना स्थल पर प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी सिर्फ एक रस्म अदायगी बनकर रह गई है। इस पूरे मामले में जब तक दोषी अधिकारियों और खदान प्रबंधकों पर गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज नहीं होता, तब तक ऐसी खूनी घटनाओं पर अंकुश लगना नामुमकिन है। यह खबर उन तमाम तत्वों को बेनकाब करती है जो व्यवस्था की नाक के नीचे कोयले के इस काले साम्राज्य को अवैध रूप से हवा दे रहे हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन केवल निर्देश देने तक सीमित रहता है या फिर इस खूनी खेल के असली किरदारों को जेल की सलाखों के पीछे भेजकर एक मिसाल कायम करता है।
