जमीन-मकान हड़पने वाले शातिर आरोपियों पर कसा शिकंजा, रेलवे कर्मी की पत्नी समेत तीन गिरफ्तार
Junaid Khan - शहडोल। जिले में फल-फूल रहा अवैध सूदखोरी का काला कारोबार अब गरीब और लाचार आम आदमी की जिंदगियों को निगलने लगा है। पुलिस और प्रशासनिक अमले की लचर कार्यप्रणाली और समय पर नकेल न कसने के कारण बेखौफ सूदखोरों केौंसले इस कदर बुलंद हो चुके हैं कि लोग मौत को गले लगाने को मजबूर हो रहे हैं। कोतवाली थाना क्षेत्र के न्यू माता मंदिर के पास वार्ड क्रमांक 24/31 निवासी 38 वर्षीय युवक नितिन गुप्ता पिता स्व. नंदलाल गुप्ता ने सूदखोरों की अमानवीय मानसिक प्रताड़ना, धमकियों और असहनीय दबाव से तंग आकर अपनी ही दुकान में फांसी के फंदे पर झूलकर आत्मघाती कदम उठा लिया। मृतक द्वारा मौत से पहले छोड़ा गया डेढ़ पेज का सुसाइड नोट इस पूरी खौफनाक वारदात और सिस्टम की नाकामी की पोल खोल रहा है, जिसमें स्पष्ट हुआ है कि कैसे चंद पैसों के लालच में बैठे शातिर दरिंदों ने एक हंसते-खेलते परिवार को सड़क पर ला दिया। पुलिस जांच और सुसाइड नोट के खुलासे के अनुसार, मृतक नितिन गुप्ता ने आरोपियों से अपनी आर्थिक तंगी के चलते करीब एक लाख रुपए उधार लिए थे। लेकिन सूदखोरों का मायाजाल ऐसा चक्रव्यूह साबित हुआ जिससे निकलना नामुमकिन था। मूल रकम से कहीं गुना अधिक पैसा और भारी-भरकम ब्याज वसूलने के बावजूद आरोपियों की भूख शांत नहीं हुई। हद तो तब हो गई जब पैसों की एवज में उसकी पुश्तैनी जमीन और आशियाना तक हथियाने की नापाक साजिश रच ली गई। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी राजेश यादव की पत्नी सरिता यादव (जो खुद रेलवे में कर्मचारी बताई जा रही है) के नाम पर जबरन जमीन की रजिस्ट्री तक करवा ली गई थी। 13 लाख रुपए में सौदा तय कर उसका पूरा घर भी हड़प लिया गया, जिसके बाद पीड़ित के पास सिर छिपाने के लिए छत तक नहीं बची थी। सब कुछ छिन जाने के बाद भी आरोपी लगातार उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे, जिसके बोझ तले टूटकर नितिन ने यह खौफनाक कदम उठाया।
कोतवाली पुलिस ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए डेढ़ पेज के सुसाइड नोट के आधार पर आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरित करने (उकसाने) की धाराओं के तहत आरोपी नितिन चौरसिया, राकेश यादव उर्फ बब्बू और उसकी पत्नी सरिता यादव को गिरफ्तार कर लिया है। हालांकि, सवाल यह उठता है कि आखिर जिले में खुलेआम चल रहे इस अवैध सूदखोरी और ब्याज के कारोबार पर प्रशासनिक अधिकारी पहले से आंखें क्यों मूंदे बैठे रहे? जब तक लोग अपनी जान गंवा देते हैं या उजड़ जाते हैं, तभी प्रशासन की नींद क्यों खुलती है? यदि समय रहते पुलिस ने इन जालसाजों और सूदखोरों के ठिकानों पर छापेमार कार्रवाई की होती, तो एक मासूम की जान बचाई जा सकती थी। इस दर्दनाक घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि महकमे की सुस्ती गरीबों के लिए मौत का परवाना बनती जा रही है, जिस पर अब कठोरतम प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई की सख्त दरकार है।
