प्रशासनिक सुस्ती और सड़कों पर बेसहारा गोवंश,सिस्टम की नाकामी पर उठे तीखे सवाल, गोवंश को राष्ट्रमाता बनाने की पुरजोर मांग

प्रशासनिक सुस्ती और सड़कों पर बेसहारा गोवंश,सिस्टम की नाकामी पर उठे तीखे सवाल, गोवंश को राष्ट्रमाता बनाने की पुरजोर मांग 



Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल शहडोल संभाग में गोवंश की दुर्दशा और प्रशासनिक उदासीनता को लेकर जनआक्रोश अब सड़कों पर उतर आया है। एक तरफ जहाँ शहर के निष्ठावान गोसेवकों और धर्मप्रेमियों ने गोमाता को 'राष्ट्रमाता' का दर्जा दिलाने और गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध जैसी ठोस माँगों को लेकर अपनी आवाज बुलंद कर दी है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय प्रशासन और शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। जय स्तंभ चौक पर जुटे हजारों गोभक्तों का यह हुजूम इस बात का प्रमाण है कि कागजी दावों और सरकारी योजनाओं के बावजूद धरातल पर गोवंश की स्थिति बेहद दयनीय बनी हुई है। इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे समर्पित गोसेवकों और जागरूक नागरिकों ने पहले 27 अप्रैल को तहसील स्तर पर लगभग 10,000 हस्ताक्षरों के साथ ज्ञापन सौंपकर अपनी मंशा स्पष्ट कर दी थी, और अब 25 जुलाई को महामहिम राज्यपाल के नाम संबोधित एक बेहद कड़ा ज्ञापन कलेक्टर को सौंपकर सिस्टम को झकझोर दिया है। गोभक्तों की इन स्पष्ट और न्यायसंगत माँगों गोमाता को राष्ट्रमाता घोषित करने, गोहत्या पर आजीवन कारावास जैसे कठोर कानून बनाने, अवैध बूचड़खानों पर बुलडोजर कार्रवाई करने और सड़कों पर लावारिस घूम रहे मवेशियों के लिए चारा-पानी व सुरक्षित आश्रय स्थल सुनिश्चित करने ने स्थानीय प्रशासन की पोल खोलकर रख दी है। 

कागजी दावों तक सिमटी सरकारी योजनाएं, हर चौराहे पर बेबस घूमता गोवंश

शहर के मुख्य मार्गों, चौराहों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर अपनी जान जोखिम में डालकर घूम रहा बेसहारा गोवंश और उनके नाम पर खर्च होने वाले प्रशासनिक बजट की सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। गोभक्तों द्वारा उठाए गए इन ज्वलनशील मुद्दों ने सरकार और स्थानीय प्रशासन के उन तमाम दावों की हवा निकाल दी है, जिसमें मवेशियों के संरक्षण के लिए बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। आज स्थिति यह है कि ठंड, गर्मी और बारिश के थपेड़े सहते हुए गोवंश या तो सड़क हादसों का शिकार होकर दम तोड़ रहा है या फिर अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ रहा है। प्रशासनिक स्तर पर करोड़ों रुपए के गोवंश शेड और चारा अनुदान के दावे किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर न तो पर्याप्त चारा उपलब्ध है और न ही बीमार व घायल मवेशियों के इलाज के लिए कोई ठोस व्यवस्था। गोवंश केवल हमारी आस्था, संस्कृति और कृषि व्यवस्था की रीढ़ ही नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की नैतिक और मानवीय संवेदनाओं का पैमाना भी है। ऐसे में, गोसेवकों द्वारा उठाया गया यह संघर्ष केवल एक धार्मिक मांग नहीं, बल्कि उस उदासीन और सुस्त तंत्र के खिलाफ एक खुली चुनौती है जो जनता के टैक्स के पैसों पर पलकर भी बेजुबानों की सुधि लेने में नाकाम साबित हुआ है। यदि शासन और प्रशासन ने अब भी अपनी कुंभकर्णी नींद नहीं तोड़ी, तो यह जनआंदोलन और अधिक उग्र रूप ले सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

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