प्रशासनिक नाकामी,18 साल बाद भी फाइलों में कैद शहडोल संभाग,20 लाख जनता के स्वाभिमान से खिलवाड़ कब तक?

प्रशासनिक नाकामी,18 साल बाद भी फाइलों में कैद शहडोल संभाग,20 लाख जनता के स्वाभिमान से खिलवाड़ कब तक? 


Junaid Khan - शहडोल। जिले को संभाग का दर्जा मिले पूरे 18 साल का लंबा अरसा बीत चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी प्रशासनिक इच्छाशक्ति के दीवालियेपन को उजागर कर रही है। आम जनता को लगा था कि संभाग बनने के बाद तहसील स्तर से लेकर बड़े ट्रांसफर, जमीनी विवाद और विभागीय फाइलों के लिए रीवा की अंतहीन दौड़ से मुक्ति मिल जाएगी। मगर बड़े हुक्मरानों की बेरुखी का आलम यह है कि आज भी छोटे-से-छोटे जरूरी काम के लिए जनता को 200 किलोमीटर दूर रीवा के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। शहडोल को 'संभागीय मुख्यालय' का भारी-भरकम नाम तो दे दिया गया, लेकिन कागजी दावों के विपरीत आज भी 32 से ज्यादा महत्वपूर्ण संभागीय कार्यालय यहां धरातल पर शुरू ही नहीं हो सके हैं। लोकायुक्त, आर्थिक अपराध शाखा, संयुक्त संचालक स्वास्थ्य, लेखा-कोष, ग्रामीण सड़क, उद्यानिकी, नगर निवेश, भू-अभिलेख, पशुपालन, मंडी, बीज निगम, मत्स्य, कौशल विकास, योजना मंडल, आबकारी, आयुष, खनिज, पीडब्लूडी, पीएचई, एनएच और शिक्षा मंडल जैसे अहम विभागों के दफ्तर या तो गायब हैं, या फिर सिर्फ नाममात्र के बोर्ड टांगकर औपचारिकता पूरी कर ली गई है। जो 10-12 दफ्तर खुले भी हैं, वे भयंकर स्टाफ कमी की वजह से खुद वेंटिलेटर पर हैं, जहाँ के बड़े साहब हफ्ते में महज दो दिन कुर्सी चमकाने आते हैं और बाकी दिन जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। नेताओं की चुप्पी और अधिकारियों की मनमानी की सजा भुगत रहे तीन जिले यह महज़ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि शहडोल, उमरिया और अनूपपुर की करीब 20 लाख आबादी के लोकतांत्रिक अधिकारों और सहूलियत पर सीधा कुठाराघात है। विडंबना देखिए कि अधिकांश सक्रिय विभाग आज भी किराए के कमरों और खस्ताहाल जगहों पर तंबू ताने बैठे हैं, क्योंकि दो दशकों में सरकार इन कार्यालयों के लिए एक अदद सरकारी भवन तक तैयार नहीं कर पाई। इस घोर प्रशासनिक निकम्मेपन की सबसे भारी कीमत यहां का अन्नदाता किसान, मरीज और छात्र भुगत रहे हैं। किसानों को बीज निगम और मंडी के काम के लिए भटकाया जा रहा है, गंभीर मरीजों को स्वास्थ्य विभाग के अनुमोदन (अप्रूवल) के लिए तड़पना पड़ता है, तो वहीं नौजवान छात्रों को शिक्षा मंडल के कागजों और आमजन को लेखा-कोष जैसी जरूरी फाइलों पर दस्तखत कराने के लिए आज भी रीवा के चक्कर लगाने को मजबूर होना पड़ रहा है। जनप्रतिधि ज्ञापन का खेल खेलकर इतिश्री कर लेते हैं, लेकिन सदन से लेकर सड़क तक इस मुद्दे पर कोई ठोस पैरवी नहीं दिखती। स्थानीय जनता का यह सीधा और तीखा सवाल है कि जब 18 साल पहले ढोल-नगाड़ों के साथ संभाग घोषित किया गया था, तो बजट, स्टाफ और भवनों की व्यवस्था करने में शासन के हाथ क्यों कांप रहे हैं? जब तक ये 32 अहम विभाग शहडोल की धरती पर पूरी ताकत से काम करना शुरू नहीं करते, तब तक हुक्मरानों द्वारा किए जा रहे "विकास" और "सुविधा" के तमाम दावे जनता की नजरों में सिर्फ और सिर्फ सफेद झूठ और कागजी पुलिंदे ही रहेंगे।

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