मौत की सेन्ट्रिंग पर टिकी थीं मजदूरों की सांसें,सुरक्षा मानकों को ठेंगा दिखा रहे रसूखदार, जिम्मेदार मौन
Junaid Khan - शहडोल। जिला मुख्यालय के वार्ड क्रमांक-28 स्थित कृष्णा कॉलोनी (सौखी मोहल्ला) में शनिवार को विकास के दावों के बीच एक खौफनाक लापरवाही का मंजर देखने को मिला। शहडोल-बुढार मार्ग पर के-स्क्वायर के ठीक सामने, क्रिश्चियन हॉस्पिटल के पीछे और साईं आईटीआई के आगे चल रहे एक विशालकाय व्यावसायिक सह आवासीय भवन के निर्माण के दौरान बड़ा हादसा हो गया। धनपुरी निवासी रसूखदार बिल्डर्स मथुरा अग्रवाल एवं मयंक अग्रवाल के इस निर्माणाधीन भवन की दूसरी मंजिल (सेकंड फ्लोर) की छत की ढलाई चल रही थी। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, भारी-भरकम प्रेशर पंपिंग फयूरी मिक्सर मशीन से कंक्रीट डालने का काम युद्ध स्तर पर जारी था और करीब 16-17 मजदूर अपनी जान जोखिम में डालकर काम कर रहे थे। इसी दौरान, ठेकेदार (तिवारी नाम के व्यक्ति) द्वारा खड़ी की गई कमजोर और रीढ़विहीन 'डबल सेन्ट्रिंग' का सामने का हिस्सा कंक्रीट के अत्यधिक भार को सह नहीं पाया और एक भयानक धमाके के साथ पूरी छत नीचे आ बैठी। छत पर काम कर रहे श्रमिक कुछ समझ पाते या संभल पाते, उससे पहले ही वे मलबे के साथ सीधे नीचे आ गिरे। हादसे के बाद मौके पर चीख-पुकार और अफरा-तफरी मच गई। आनन-फानन में स्थानीय निवासियों ने साहस दिखाते हुए मलबे से घायलों को बाहर निकाला, अन्यथा कोई बड़ी जनहानि हो सकती थी। हादसे में दमोह निवासी तीन मजदूर पुष्पेंद्र अहिरवार (20 वर्ष), मूरत अहिरवार (35 वर्ष) एवं बृजेश अहिरवार (30 वर्ष) गंभीर रूप से चोटिल हो गए। ठेकेदार के मैनेजर रणजीत सिंह के अनुसार, तीनों घायलों को निजी आदित्य हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है, जहां उनकी हालत फिलहाल स्थिर बताई जा रही है। लेकिन इस हादसे ने निजी अस्पतालों की कमाई और गरीब मजदूरों की बेबसी को एक बार फिर चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।
प्रशासनिक साठगांठ या खुली छूट? टाउन एंड कंट्री प्लानिंग और नगर पालिका की भूमिका पर गंभीर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने जिले के प्रशासनिक तंत्र, नगर पालिका और 'टाउन एंड कंट्री प्लानिंग' (टीएंडसीपी) के दावों की पोल खोलकर रख दी है। जिला मुख्यालय के रिहायशी इलाकों में इतनी बड़ी बिल्डिंग्स तान दी जाती हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी एयरकंडीशंड कमरों से बाहर निकलने की जहमत नहीं उठाते। क्या इस बहुमंजिला इमारत के पास वैध निर्माण अनुमति (बिल्डिंग परमिशन) थी? क्या निर्माण स्थल पर सुरक्षा नेट, हेलमेट या लाइफ-सेविंग गियर की उपलब्धता की जांच कभी किसी श्रम विभाग के इंस्पेक्टर या प्रशासनिक अमले ने की?
हादसे की खबर मिलते ही डायल-112 और स्थानीय पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर जांच की औपचारिकता तो शुरू कर दी है, लेकिन यह जांच महकमे की नाकामी को छुपाने का एक जरिया मात्र नजर आती है। स्थानीय नागरिकों का स्पष्ट आरोप है कि रसूखदारों के दबाव में अक्सर ऐसे गंभीर मामलों को दबा दिया जाता है। प्रारंभिक तौर पर भले ही इसे डबल सेन्ट्रिंग की कमजोरी माना जा रहा हो, लेकिन असल कमजोरी उस प्रशासनिक लचर व्यवस्था की है जो चंद रुपयों की खनक के आगे घुटने टेक देती है। अब देखना यह होगा कि पुलिस और जिला प्रशासन इस मामले में बिल्डर और ठेकेदार के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराओं में ममला दर्ज करता है या फिर कागजी खानापूर्ति कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।


