छात्र आंदोलन पर पुलिसिया बर्बरता से उभरा जनाक्रोश,शहडोल भाजपा में बड़ी बगावत

पूर्व जिला मीडिया प्रभारी शैलेंद्र श्रीवास्तव ने दिया इस्तीफा; प्रशासन के रवैये और पार्टी के ढुलमुल रवैये पर उठाए गंभीर सवाल


Junaid Khan - शहडोल। दिल्ली में हक और न्याय की आवाज उठा रहे निर्दोष छात्रों पर हुए पुलिसिया दमन और प्रशासनिक हठधर्मिता का असर अब विंध्य की राजनीति में सीधे तौर पर देखने को मिल रहा है। दिल्ली के चर्चित छात्र आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हुई बर्बरता और दमनकारी रवैये के विरोध में शहडोल भाजपा में एकाएक बड़ा राजनीतिक भूचाल आ गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व जिला मीडिया प्रभारी शैलेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने शुक्रवार को शासन-प्रशासन के रवैये और सत्ता के दबाव में लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन का कड़ा विरोध करते हुए भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना त्यागपत्र जिला अध्यक्ष को सौंपते हुए इसकी प्रतिलिपि प्रदेश अध्यक्ष को भी भेजी है।

सत्ता के गलियारों में हड़कंप,अंदरूनी घमासान हुआ सतह पर 

शैलेंद्र कुमार श्रीवास्तव के इस कड़े कदम के बाद जिला भाजपा संगठन सहित प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है। त्यागपत्र में उन्होंने स्पष्ट उल्लेख किया है कि वर्ष 2016-17 में भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने के बाद से उन्होंने लगातार संगठन के प्रचार-प्रसार और जनहित के आंदोलनों में अग्रिम भूमिका निभाई। हालांकि, 2022 में दुर्भावनापूर्ण तरीके से उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों का मनगढ़ंत आरोप लगाकर निष्कासित किया गया था, लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव से पूर्व उनकी योग्यता को देखते हुए सदस्यता बहाल की गई थी। अब दिल्ली में शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगों को रख रहे युवाओं-छात्रों पर जिस तरह प्रशासनिक बल का प्रयोग कर लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की आजादी को कुचला गया है, उससे आहत होकर उन्होंने पद और पार्टी दोनों को अलविदा कह दिया है।

जनहित को दरकिनार करने वाली प्रशासनिक कार्यशैली पर उठे कड़े सवाल 

स्थानीय स्तर पर इस घटनाक्रम को महज एक इस्तीफा नहीं, बल्कि सत्ता और प्रशासन की कार्यप्रणाली के खिलाफ बढ़ते जनअसंतोष के रूप में देखा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि प्रशासन और जिम्मेदार तंत्र जिस तरह अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए आम जनता व युवाओं की आवाज दबाने का काम कर रहा है, उससे कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों में भारी आक्रोश पनप रहा है। सत्ता के संरक्षण में प्रशासनिक अधिकारियों की बेलगाम कार्यशैली और जनविरोधी रवैये ने अब अपनों को ही बागी बनने पर मजबूर कर दिया है। इस इस्तीफे के बाद जहां भाजपा संगठन में खलबली मची हुई है, वहीं राजनीतिक गलियारों में इस बात की पुरजोर चर्चा है कि अगर तंत्र ने अपनी कार्यशैली नहीं सुधारी, तो आने वाले दिनों में यह चिंगारी और बड़े राजनीतिक संकट का रूप ले सकती है।

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