सोनोग्राफी डॉक्टर के 5 दिन के अवकाश पर जाते ही चरमराई कुशाभाऊ ठाकरे जिला अस्पताल की सांसे
गर्भवती महिलाओं को दी जा रही 10 अगस्त तक की लंबी वेटिंग, मजबूर होकर हजार-दो हजार लुटाने निजी क्लिनिक पहुंच रहे बेबस मरीज
Junaid Khan - शहडोल। शासकीय कुशाभाऊ ठाकरे जिला चिकित्सालय में स्वास्थ्य सेवाओं और प्रशासनिक संवेदनहीनता का ऐसा भयानक रूप देखने को मिल रहा है, जिसने आम जनता और दूर-दराज से आने वाले गरीब मरीजों का जीना दूभर कर दिया है। कहने को तो यह संभाग का सबसे बड़ा जिला अस्पताल है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यहाँ की व्यवस्थाएं पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुकी हैं। अस्पताल का सोनोग्राफी कक्ष इन दिनों केवल एक डॉक्टर के भरोसे चल रहा है, और जैसे ही डॉक्टर साहब छुट्टी पर गए, पूरी सोनोग्राफी सेवा ठप होकर रह गई। सोनोग्राफी कराने आ रही गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को बिना जांच कराए बैरंग वापस लौटना पड़ रहा है या फिर उन्हें आगामी 10 अगस्त तक की लंबी-चौड़ी वेटिंग थमा दी जा रही है। एक तरफ अस्पताल प्रशासन वैकल्पिक व्यवस्था करने में पूरी तरह नकारा साबित हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ मजबूरी में मरीजों को जेब ढीली कर निजी सोनोग्राफी सेंटरों की ओर रुख करना पड़ रहा है। विभागीय जानकारों की मानें तो यह पूरी अव्यवस्था कहीं न कहीं निजी सेंटरों को फलने-फूलने देने और गरीब जनता का आर्थिक शोषण कराने की एक सोची-समझी लापरवाही का हिस्सा प्रतीत होती है।
डॉक्टर प्रजापति 5 दिन की छुट्टी पर, 27 जुलाई तक मचेगा हाहाकार,एक डॉक्टर के भरोसे कैसे चलेगा संभाग का अस्पताल?
अस्पताल से मिली जानकारी के मुताबिक सोनोग्राफी कक्ष की कमान संभालने वाले डॉक्टर प्रजापति 22 जुलाई से 5 दिनों के लंबे अवकाश पर चले गए हैं और अब वे आगामी सोमवार को ही वापस लौटेंगे। उनके जाते ही गुरुवार को अस्पताल में सोनोग्राफी कराने पहुंची सैकड़ों गर्भवती महिलाओं व मरीजों को बिना जांच के ही रोते-बिलखते वापस लौटना पड़ा। स्थिति यह है कि 22 जुलाई से शुरू हुआ यह संकट 27 जुलाई तक लगातार जारी रहेगा। सवाल यह उठता है कि जिला अस्पताल प्रबंधन को डॉक्टर के अवकाश पर जाने की जानकारी पहले से होने के बावजूद किसी बैकअप या वैकल्पिक डॉक्टर की तैनाती क्यों नहीं की गई? जिला चिकित्सालय में रोजाना ओपीडी और प्रसूति (मैटर्निटी) वार्ड से मिलाकर दर्जनों अति-संवेदनशील मामले आते हैं, जहां तत्काल सोनोग्राफी की सख्त दरकार होती है। रोजाना औसतन केवल 30 से 35 मरीजों की ही जांच हो पाती थी, ऐसे में डॉक्टर के जाते ही दबाव इतना बढ़ गया है कि ओपीडी के बाहर मरीजों की लंबी-लंबी लाइनें लग रही हैं और अफरा-तफरी का माहौल बना हुआ है।
प्रसूति वार्ड की सुविधा दो माह से ठप, वैकल्पिक नियुक्ति में नाकाम स्वास्थ्य विभाग की नाकामी की सजा भुगत रही जनता
लापरवाही की इंतहा यहीं खत्म नहीं होती। जिला अस्पताल के प्रसूति वार्ड में भर्ती प्रसूताओं के लिए अलग से शुरू की गई सोनोग्राफी सुविधा पिछले दो महीनों से पूरी तरह बंद पड़ी है। जब तक बॉन्ड वाले चिकित्सक अपनी सेवाएं दे रहे थे, तब तक यह सुविधा किसी तरह घिसट-घिसट कर चल रही थी, लेकिन बॉन्ड अवधि समाप्त होते ही इस सेवा पर ताला लटका दिया गया। नतीजा यह हुआ कि प्रसूति वार्ड की तमाम गर्भवती महिलाओं का पूरा दबाव अब ओपीडी वाले एकमात्र सोनोग्राफी कक्ष पर आ पड़ा है। जब तक स्वास्थ्य विभाग या अस्पताल प्रशासन यहां दूसरे नियमित सोनोग्राफी चिकित्सक की स्थायी पोस्टिंग नहीं करता, तब तक स्थिति में सुधार की कोई गुंजाइश नजर नहीं आ रही है। सोमवार को जब अवकाश से डॉक्टर लौटेंगे, तब तक स्थिति और अधिक विस्फोटक हो चुकी होगी। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) और जिला प्रशासन की इस आपराधिक चुप्पी ने जिले की स्वास्थ्य सेवाओं की कलाई खोलकर रख दी है। यदि समय रहते दूसरे चिकित्सक की व्यवस्था नहीं की गई, तो कभी भी किसी गंभीर मरीज के साथ अनहोनी घटना घट सकती है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी अस्पताल प्रशासन और जिला स्वास्थ्य विभाग की होगी।
अधिकारियों का गैर-जिम्मेदाराना बयान
समस्या तो है। सोनोग्राफी करने के लिए यहां पर एक ही डॉक्टर हैं, उनको काम पड़ता है तो अवकाश लेना ही पड़ेगा। वह पांच दिन के अवकाश पर हैं। जब डॉक्टर न रहेंगे तो वेटिंग तो बढ़ेगी ही।
डॉ. शिल्पी सराफ, सिविल सर्जन,जिला अस्पताल-शहडोल
