जनता के टैक्स का पैसा मंजूर फिर भी जिम्मेदार बने मौन,विधायक-सांसद और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर उठने लगे गंभीर सवाल
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश में उच्च शिक्षा के स्तर को सुधारने और विद्यार्थियों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावे उस वक्त हवा-हवाई साबित होते हैं, जब मुख्यमंत्री स्तर से स्वीकृत विकास योजनाएं मंत्रालय के गलियारों में धूल फांकने लगती हैं। पं. शंभूनाथ शुक्ल विश्वविद्यालय के पुराने परिसर में एग्जामिनेशन सेंटर और प्राध्यापकों के लिए आवासीय परिसर निर्माण का मामला इसका जीता-जागता उदाहरण है। विश्वविद्यालय प्रशासन की मांग पर मुख्यमंत्री ने इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए 45 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि की स्वीकृति दी थी, जिसे कैबिनेट और वित्त विभाग से भी हरी झंडी मिल चुकी है। डीपीआर (DPR) तैयार कर शासन स्तर पर भेजी जा चुकी है, लेकिन विभागीय मुख्यालय व मंत्रालय में यह फाइल पिछले डेढ़ वर्ष से सिर्फ इसलिए अटकी है क्योंकि जिम्मेदार अफसरों के पास जनहित के इन कामों के लिए फुर्सत नहीं है। नतीजतन, पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया अधर में लटकी हुई है और सरकार की घोषणा के बावजूद विकास कार्य धरातल पर शुरू नहीं हो सके हैं। इस घोर लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता का सीधा खामियाजा दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से आने वाले हजारों असहाय विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है। वर्तमान में परीक्षा और अन्य प्रशासकीय कार्यों का संचालन नवलपुर परिसर से हो रहा है, जिससे परीक्षा संबंधी छोटे-छोटे कागजी काम के लिए भी छात्रों को पुराने कैंपस से नवलपुर जाना पड़ता है। इस व्यवस्था के कारण दूर-दराज से आने वाले निर्धन विद्यार्थियों को मजबूरी में 200 से 250 रुपये का भारी-भरकम ऑटो किराया देना पड़ रहा है, जिससे उनके समय के साथ-साथ आर्थिक शोषण भी हो रहा है। इसके साथ ही, स्थानीय विधायक, सांसद और जनप्रतिनिधियों की इस मुद्दे पर साध रखी गई चुप्पी जनता के गुस्से को बढ़ा रही है। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले जनप्रतिनिधि और क्षेत्रीय नेता इस गंभीर जनसमस्या पर चुप्पी साधे बैठे हैं। एग्जामिनेशन सेंटर के अभाव में विश्वविद्यालय के 12 हजार से अधिक नियमित छात्रों के साथ-साथ इससे संबद्ध लगभग 42 कॉलेजों के हजारों विद्यार्थियों का भविष्य और समय दांव पर लगा है। प्रशासनिक स्तर पर इस गंभीर लेथारजी (शिथिलता) ने विभागीय अफसरों और मंत्रालय के रवैये पर कड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपनी ओर से संपूर्ण कागजी प्रक्रिया पूर्ण कर फाइल भेज दी है, तब डेढ़ साल तक उसे रोककर रखना अधिकारियों की कार्यशैली और मंशा पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। कुलपति प्रो. रामशंकर का भी साफ कहना है कि विश्वविद्यालय स्तर से डीपीआर और प्रस्ताव बहुत पहले भेजा जा चुका है, लेकिन स्वीकृति मंत्रालय में अटकी हुई है। यदि 45 करोड़ रुपये की स्वीकृत फाइल पर इसी तरह लालफीताशाही का ताला लगा रहा, तो विद्यार्थियों और स्थानीय जनता का सब्र का बांध जल्द टूट सकता है। अब देखना यह होगा कि सो रहा प्रशासन और मौन साधे बैठे जनप्रतिनिधि इस खबर के बाद नींद से जागते हैं या फिर छात्रों का भविष्य ऐसे ही फाइलों के नीचे दबा रहेगा।
