शासन-प्रशासन की मुस्तैदी और बेटियों की हिम्मत से टला बड़ा हादसा, 72 घंटे बाद फोन पर परिजनों से संपर्क होने से मिला सुकून
Junaid Khan - शहडोल। कोतमा। पड़ोसी देश नेपाल में अचानक आई भीषण प्राकृतिक आपदा और महासैलाब के भयानक मंजर के बीच मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के कोतमा की दो जांबाज बेटियों ने न केवल अपने अदम्य साहस का परिचय दिया, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करते हुए सुरक्षित वापस लौटकर एक मिसाल पेश की है। कोतमा के वार्ड क्रमांक 8 निवासी संतोष मांझी एवं उनकी पत्नी ललिता मांझी की पुत्रियां पलक मांझी (25 वर्ष) और पल्लवी मांझी (23 वर्ष), जो ग्वालियर की निजी कंपनियों में कार्यरत हैं, बीते 21 अगस्त को ग्वालियर से 2, इंदौर से 3 और लखनऊ से 1 अन्य साथी के साथ कुल 9 लोगों के दल में नेपाल भ्रमण पर गई थीं। 23 अगस्त को परिजनों से अंतिम बार बातचीत होने के बाद नेपाल में आए जलप्रलय के कारण नेटवर्क ठप हो गया और बेटियों से संपर्क पूरी तरह टूट गया। परिजनों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, लेकिन संकट की इस कठिन घड़ी में परिजनों का हौसला और बेटियों का आत्मबल ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
भोपाल से दिल्ली तक दौड़ा प्रशासनिक अमला, समन्वय ने बचाई जान
जैसे ही कोतमा में बेटियों के लापता होने और महासैलाब में फंसने की सूचना प्रशासन तक पहुंची, वैसे ही राज्य सरकार, स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन एवं वरिष्ठ अधिकारियों ने त्वरित संवेदनशीलता दिखाई। परिजनों की चिंता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और पुलिस के आला अधिकारियों ने बिना समय गंवाए भोपाल स्थित राज्य आपदा नियंत्रण कक्ष और नई दिल्ली स्थित केंद्रीय विदेश मंत्रालय व राहत राहत एजेंसियों से संपर्क स्थापित किया। वरिष्ठ अधिकारियों ने दिन-रात एक करके नेपाल स्थित भारतीय दूतावास और स्थानीय राहत दल के साथ लगातार समन्वय बनाए रखा। इस मुस्तैद प्रशासनिक तंत्र और पुलिस की त्वरित कार्रवाई का ही नतीजा रहा कि आपदा प्रभावित क्षेत्र से बेटियों की लोकेशन ट्रैक की जा सकी। प्रशासन की इस सक्रियता और जनता के प्रति जवाबदेही की स्थानीय निवासियों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है।
72 घंटे के खौफनाक इंतजार के बाद गूंजी राहत की घंटी,26 अगस्त को आया फोन
पूरे तीन दिनों तक (72 घंटे) परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था और पूरा कोतमा शहर इन बेटियों की सलामती की दुआएं मांग रहा था। लगातार 24 से 26 अगस्त तक शासन और प्रशासन के अधिकारियों के सतत संपर्क के बीच 26 अगस्त को आखिरकार परिजनों के फोन की घंटी बजी। किसी दूसरे नंबर से आई इस कॉल पर जब बेटियों की आवाज गूंजी और उन्होंने खुद के पूरी तरह सुरक्षित होने की जानकारी दी, तो न केवल मांझी परिवार बल्कि पूरे प्रशासनिक अमले ने राहत की गहरी सांस ली। नेपाल के दुर्गम और आपदाग्रस्त इलाकों में नेटवर्क ध्वस्त होने के बावजूद दोनों बेटियों ने धैर्य नहीं खोया और सूझबूझ का परिचय देते हुए सुरक्षित स्थान पर पहुंचकर अपनों को संदेश भेजा। बेटियों का यह हौसला, शासन-प्रशासन का त्वरित सहयोग और जनता का अटूट विश्वास आज इस बात की गवाही दे रहा है कि यदि हिम्मत और प्रशासनिक इच्छाशक्ति साथ हो, तो बड़ी से बड़ी आपदा को भी मात दी जा सकती है।
