महिलाओं की रही भारी भागीदारी,संवैधानिक व धार्मिक अधिकारों के संरक्षण की मांग
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश शासन द्वारा प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) के मसौदे को लेकर जिले में विरोध के स्वर मुखर हो गए हैं। सोमवार, 24 अगस्त को जमीयत उलेमा-ए-हिंद जिला शहडोल के बैनर तले मुस्लिम समुदाय ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर महामहिम राष्ट्रपति महोदया के नाम जिला कलेक्टर शहडोल को एक विस्तृत अभ्यावेदन व आपत्ति पत्र सौंपा। कलेक्ट्रेट परिसर में आयोजित इस ज्ञापन कार्यक्रम में न केवल मुस्लिम समुदाय के प्रबुद्धजन बल्कि भारी तादाद में मुस्लिम महिलाओं ने भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद करते हुए प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन की कार्यशैली पर भरोसा जताया और राष्ट्रपति से मांग की कि प्रस्तावित यूसीसी पर अंतिम निर्णय लेते समय मुस्लिम समाज के संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता, मुस्लिम पर्सनल लॉ, सामाजिक सद्भाव और भारतीय संविधान की मूल भावना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। ज्ञापन में विधिक व संवैधानिक तर्कों को सामने रखते हुए स्पष्ट किया गया कि भारतीय संविधान केवल समानता का ही नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विविधता और विभिन्न समुदायों की पहचान के संरक्षण का भी दस्तावेज है। इसमें रेखांकित किया गया कि संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों (DPSP) का हिस्सा है, जिसे अनुच्छेद 37 के तहत न्यायालय द्वारा बाध्यकारी नहीं बनाया गया है; अतः किसी भी कानून के निर्माण में भाग-3 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए। ज्ञापन में शरीयत एप्लिकेशन अधिनियम 1937 का हवाला देते हुए कहा गया कि निकाह, तलाक, वसीयत व उत्तराधिकार जैसे मामले मुस्लिम समाज की अटूट धार्मिक आस्था और कुरआन-हदीस पर आधारित हैं, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 के तहत संरक्षण प्राप्त है। समानता का वास्तविक अर्थ एकरूपता नहीं है, और जब प्रस्तावित कानून में अनुसूचित जनजातियों (आदिवासियों) व अन्य विशेष समूहों को उनकी परंपराओं के आधार पर छूट दी जा रही है, तो वही संवैधानिक सिद्धांत मुस्लिम पर्सनल लॉ पर भी लागू होना चाहिए। समुदाय के प्रतिनिधियों ने 21वें विधि आयोग की वर्ष 2018 की रिपोर्ट का उल्लेख किया, जिसमें आयोग ने स्पष्ट कहा था कि वर्तमान परिस्थितियों में समान नागरिक संहिता न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय। ज्ञापन में राष्ट्रपति से मांग की गई कि मसौदे पर प्राप्त सभी आपत्तियों व सुझावों पर निष्पक्ष एवं पारदर्शी विचार किया जाए, धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले प्रावधानों पर पुनर्विचार हो, और यदि आवश्यकता पड़े तो विधेयक को राज्य सरकार के पास संशोधन हेतु वापस भेजा जाए। साथ ही, अंतिम निर्णय से पूर्व सभी धार्मिक समुदायों, विधि विशेषज्ञों, महिला संगठनों, शिक्षाविदों एवं नागरिक समाज के साथ व्यापक व पारदर्शी सार्वजनिक संवाद आयोजित कराया जाए ताकि सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक विश्वास अक्षुण्ण बना रहे। इस अवसर पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के जिला अध्यक्ष मौलाना ज़रयाब साकिबी, सरपरस्त हाजी सरवर अली, जिला उपाध्यक्ष हाजी इरशाद, शहर अध्यक्ष हाजी ज़करिया फारूकी, सचिव एजाज फारूकी, मीडिया प्रभारी हसीब अख्तर, उम्मत फाउंडेशन से राशिद अंसारी, जमाते इस्लामी हिंद से असलम सहित सैकड़ों की संख्या में मुस्लिम समाज के गणमान्य नागरिक व महिलाएं उपस्थित रहीं। कलेक्ट्रेट में ज्ञापन सौंपते हुए प्रतिनिधियों ने आशा व्यक्त की कि केंद्र व राज्य सरकारें जनता की इन संवैधानिक एवं न्यायसंगत भावनाओं को संज्ञान में लेकर सकारात्मक कदम उठाएंगी।


