वनाधिकार कानून को ताक पर रखकर सहायक वन परिक्षेत्र अधिकारी की मनमानी,गोंगपा ने उग्र आंदोलन की दी चेतावनी
Junaid Khan - शहडोल। व्यौहारी प्रदेश में आदिवासियों के अधिकारों और वनाधिकार अधिनियम (2006 व 2012) के बड़े-बड़े दावों की जमीनी हकीकत उस वक्त उजागर हो गई, जब वन विभाग के गैर-जिम्मेदाराना रवैये और प्रशासनिक तानाशाही की शिकार एक गरीब आदिवासी किसान की आवाज बनकर आम जनता व जन-संगठन सडकों पर उतर आए। मामला पश्चिम व्यौहारी वन मंडल (उत्तर शहडोल) के अंतर्गत ग्राम जमुनी का है, जहाँ वर्षों से काबिज अनुसूचित जनजाति के पीड़ित ग्रामीण प्यारेलाल कोल (पिता लुखुआ कोल) के खिलाफ वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा दुर्भावनापूर्ण और फर्जी वन अपराध प्रकरण दर्ज कर न्यायालय में घसीटने का गंभीर मामला सामने आया है। स्थानीय प्रशासन की इस एकतरफा व अमानवीय कार्रवाई के विरोध में ग्रामीणों के समर्थन में खड़े हुए गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंगपा) के कार्यकर्ताओं और जन-प्रतिनिधियों ने शासन-प्रशासन के खिलाफ हुंकार भरते हुए स्पष्ट कर दिया है कि गरीबों पर प्रशासनिक अत्याचार अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मामले की पृष्ठभूमि में सामने आया है कि पीड़ित प्यारेलाल कोल का परिवार पीढ़ियों से उक्त वनभूमि पर काबिज रहकर खेती-किसानी के जरिए अपनी आजीविका चला रहा है। वह बाणसागर परियोजना से भी प्रभावित भूमिहीन आदिवासी परिवार से आता है, जो नियमानुसार वनाधिकार पट्टा पाने का पूर्ण हकदार है। बावजूद इसके, सहायक वन परिक्षेत्र अधिकारी अल्हरा एवं संबंधित वन अधिकारियों द्वारा व्यक्तिगत द्वेष भावना के चलते गरीब किसान को न्यायसंगत अधिकार देने के बजाय उस पर 'अवैध अतिक्रमण' का झूठा प्रकरण तैयार कर दिया गया। पार्टी के ब्लॉक अध्यक्ष अजय सिंह पैंड्रो के नेतृत्व में सौपे गए ज्ञापन में जिम्मेदार अफसरों की लापरवाही और द्वेषपूर्ण कार्यशैली का भंडाफोड़ किया गया है। जन-संगठनों ने दोटूक लहजे में चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही पीड़ित आदिवासी को न्याय नहीं मिला और फर्जी मामला वापस लेकर उसे वनाधिकार पत्र (पट्टा) प्रदान नहीं किया गया, तो पूरे अंचल में व्यापक स्तर पर उग्र जन-आंदोलन छेड़ा जाएगा, जिसकी संपूर्ण जवाबदेही निरंकुश प्रशासनिक तंत्र और संबंधित अधिकारियों की होगी।
