कानून के रखवालों के घर में ही सेंध,खाकी के इकबाल और घरेलू नौकरों के सत्यापन पर उठे तीखे सवाल
Junaid Khan - शहडोल। अनूपपुर जिले में अपराध और अपराधियों के हौसले किस कदर बुलंद हैं, इसकी बानगी तब देखने को मिली जब अपराधियों ने आम जनता को छोड़ सीधे पुलिस प्रशासन के नुमाइंदों को ही अपना निशाना बना डाला। मामला अनूपपुर जिले में पदस्थ महिला पुलिस कांस्टेबल सरिता चतुर्वेदी से जुड़ा हुआ है, जो वर्तमान में शहडोल स्थित श्रीराम रेसीडेंसी फेस-2 में निवास कर रही हैं। स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के कारण एक रिश्तेदार के माध्यम से केवल दो दिन पूर्व ही दो महिलाओं रानी वर्मा और लक्ष्मी वर्मा को घरेलू कामकाज के लिए उनके आवास पर भेजा गया था। दोनों महिलाएं जब पीड़िता के साथ डॉक्टर के पास चेकअप कराने गईं, उसी दौरान कार में रखे पर्स से सोने की चेन, लॉकेट और चांदी की पायल सहित लगभग 70 से 80 हजार रुपये के कीमती आभूषण पार कर चंपत हो गईं। हालांकि, घटना के बाद हरकत में आई कोतवाली पुलिस ने तकनीकी माध्यमों का सहारा लेकर दोनों संदिग्ध महिलाओं को छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से धर दबोचा और शहडोल लाकर धारा 303(2), 306, 3(5) बीएनएस (BNS) के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। लेकिन इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक और पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। इस सनसनीखेज वारदात ने पुलिस महकमे के भीतर सुरक्षा दावों और घरेलू सहायकों के पुलिस सत्यापन अभियान की पोल खोलकर रख दी है। जब स्वयं खाकी वर्दीधारी कर्मचारी ही बिना किसी कड़े सत्यापन और पहचान की पुष्टि के अपने ही घरों में संदिग्ध लोगों को शरण दे रहे हैं, तो आम जनता से पुलिस सुरक्षा और सत्यापन की उम्मीद कैसे की जा सकती है? जिले में लंबे समय से घरेलू नौकरों, किराएदारों और बाहरी संदिग्ध व्यक्तियों के अनिवार्य सत्यापन का ढिंढोरा पीटा जाता रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ कागजी औपचारिकता तक सीमित रह गई है। जिम्मेदार प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी अपने ही अधीन आने वाले कर्मचारियों को नियम-कायदों का पाठ पढ़ाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं। पुलिस महकमे के भीतर पसरी इस घोर लापरवाही और लचर कार्यप्रणाली का ही नतीजा है कि बेखौफ शातिर अपराधी अब कानून के पहरेदारों के निजी सामान और गाड़ियों पर हाथ साफ करने से भी नहीं हिचक रहे हैं। यह घटना सीधे तौर पर जिला पुलिस अधीक्षक और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की कार्यशैली और मैदानी मॉनिटरिंग पर कड़ा प्रहार करती है। पुलिस का मुख्य काम क्षेत्र में मुस्तैदी के साथ अपराध पर अंकुश लगाना और आम नागरिकों को सुरक्षा का अहसास कराना है, परंतु जब खुद पुलिसकर्मी ही इस तरह की ठगी व चोरी का शिकार बन रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक व्यवस्था के इकबाल पर बड़ा धब्बा है। यदि समय रहते पुलिस प्रशासन ने अपने ही तंत्र में फैली इस ढिलाई को दुरुस्त नहीं किया और बाहरी/संदिग्ध व्यक्तियों के भौतिक सत्यापन को कड़ाई से लागू नहीं कराया, तो आने वाले समय में आम जनता का भरोसा कानून व्यवस्था से पूरी तरह उठ जाएगा। उच्चाधिकारियों को चाहिए कि केवल मामले में एफआईआर (FIR) दर्ज कर इतिश्री करने के बजाय, इस प्रकार की घोर मानवीय व रणनीतिक लापरवाही के लिए जिम्मेदार व्यवस्था पर सख्त रुख अपनाएं और कड़े कदम उठाएं।
