स्वास्थ्य महकमे की नाकामी या मिलीभगत,होम्योपैथी के रजिस्ट्रेशन पर धड़ल्ले से चल रहा था एलोपैथिक का अवैध खेल

सरईकापा में 'डॉ. बड़गैय्या क्लीनिक' सील, पर बड़ा सवाल,वर्षों से जनता की जिंदगी से खिलवाड़ पर मौन क्यों था विभाग? 


Junaid Khan - शहडोल। जिले के स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक तंत्र की लचर कार्यशैली का एक और बड़ा और गंभीर कारनामा उजागर हुआ है। बुढ़ार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सरईकापा के पास संचालित 'डॉ. बड़गैय्या क्लीनिक' पर स्वास्थ्य विभाग की टीम ने दबिश देकर भले ही उसे सील कर दिया हो, लेकिन इस कार्रवाई ने विभाग और स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, उक्त क्लीनिक के पास केवल होम्योपैथिक चिकित्सा का रजिस्ट्रेशन था, लेकिन नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए वहां बेधड़क मरीजों को भर्ती कर एलोपैथिक पद्धतियों से इलाज किया जा रहा था। यह पूरा खेल किसी एक दिन का नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहा था। सवाल यह उठ रहा है कि जब विभाग को इसकी जानकारी थी और बार-बार चेतावनियां दी जा रही थीं, तो इतने दिनों तक आम जनता की जान को जोखिम में डालने का लाइसेंस किसने दे रखा था? केवल सील लगाने की रस्म अदायगी करके क्या स्वास्थ्य महकमा अपनी आपराधिक लापरवाही से पल्ला झाड़ सकता है? जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल, आखिर कब तक चलेगा 'चेतावनी' का खेल?मामले में जब स्वास्थ्य विभाग की टीम ने क्लीनिक के दस्तावेजों को खंगाला, तो नियमों के उल्लंघन की परतें खुलती चली गईं। मौक़े पर कार्रवाई करने पहुंचे डीएचओ डॉ. एसडी कंवर ने बताया कि मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) के निर्देशों पर यह बड़ी कार्रवाई की गई है। अधिकारी का कहना है कि क्लीनिक संचालक को कई बार चेतावनी दी गई थी, लेकिन स्थिति में कोई सुधार न होने के बाद अंततः क्लीनिक को सील किया गया। लेकिन प्रशासनिक कार्यप्रणाली का सबसे शर्मनाक पहलू यही है। आखिर इंसानी जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले झोलाछाप और अवैध रूप से क्लीनिक चलाने वालों को 'चेतावनी' देने का क्या औचित्य है? क्या विभाग किसी बड़े हादसे या मरीज की मौत का इंतजार कर रहा था? स्थानीय ग्रामीणों और प्रबुद्ध नागरिकों का स्पष्ट कहना है कि जिम्मेदार स्वास्थ्य अधिकारियों और क्षेत्रीय अमले की कथित 'मेहरबानी' और ढुलमूल रवैये के कारण ही ग्रामीण अंचलों में ऐसे अवैध क्लीनिक फल-फूल रहे हैं। सरकारी संरक्षण और प्रशासनिक ढिलाई से ग्रामीण इलाकों में पनप रहा अवैध डॉक्टरी का 'सिंडिकेट' सरईकापा की यह घटना केवल एक बानगी है; पूरे जिले के दूर-दराज के इलाकों में स्वास्थ्य विभाग और शासन-प्रशासन की नाक के नीचे फर्जी और अवैध क्लीनिकों का जाल बिछा हुआ है। होम्योपैथी, आयुर्वेदिक या बिना किसी वैध डिग्री के आधार पर गंभीर मरीजों का एलोपैथिक इलाज करना और उन्हें भर्ती कर भारी भरकम रकम वसूलना एक बड़ा संगठित कारोबार बन चुका है। शासन-प्रशासन की इस आपराधिक चुप्पी और सिर्फ 'दिखावे' के लिए यदा-कदा की जाने वाली सीलिंग कार्रवाई से अवैध संचालकों के हौसले पस्त होने के बजाय और बुलंद हो रहे हैं। यदि मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और जिले के आला प्रशासनिक अधिकारी इस फर्जीवाड़े को लेकर सचमुच गंभीर हैं, तो केवल क्लीनिक सील करने तक बात सीमित न रखी जाए, बल्कि अवैध रूप से मरीजों की जान से खेलने वाले संचालकों पर एफआईआर दर्ज कर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए। साथ ही, उन जिम्मेदार मैदानी अधिकारियों की भी जवाबदेही तय हो, जिनकी आंखों के सामने महीनों से यह अवैध खेल बेधड़क फल-फूल रहा था।

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